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Wednesday, February 1, 2012

कोई चला तो था इन राहों में......

कोई चला तो था साथ तेरे कुछ दूर तलक
पूछा करती है अक्सर ये सुनसान सड़क 
कौन से दयार पर हयात ले आई आज 
रही न वो बेखुदी जिसपे करते थे नाज़ 

न वो दस्त-ए-यार रहे न कोई हमसफ़र
बीते तमाम खुशनुमा पहर; ढल गयी मुबारक सहर
हमदम फ़क़त खामोश राहेंये मैला असमान 
सरमाया फ़क़त तीरगी में लिपटा एक खाली सा मकान 


ये  किसके घर में आ रुका मेरा कारवां 
हँसते हैं साए अजनबी से, आईनों में जहाँ 
सराब निकली वो राह-ए-ख्वाब-ए-हयात 
चले थे जिस पे कभी हम साथ साथ 

पता न था करेंगे इस कदर शिकवा तेरा 
होगा तेरी ही तन्हाई से फिर निकाह मेरा 
ये स्याह ख़ार-ए-दर्दये कहर तेरा 
है वफ़ा-ए-पाक का इनाममेहर मेरा 



चलता रहे तुम्हारा  सिलसिला-ए-तिजारत यूँ ही
मांगी फिर एक दुआ तेरे लिए  ही 
के हो न जाए कभी शर्मसार मेरा यार-ए-दरिं 
खुदा ना ही करवाए तुझे अब दीदार मेरा 

चूर चूर बिखरा वो आईना 'हमारा'
रहा अक्स को भी नागवार साथ तेरा-मेरा
रिहा कर दिए आज खुद से तेरे आखिरी निशां
के उढ़ा आये सबाह में ख़ाक -ए-आशियाँ 
                                                                                   



  • हयात=ज़िन्दगी/Life 
  • दस्त-ए-यार=यार के हाथ/Hands of the beloved
  • फ़क़त =सिर्फ/Only
  • सरमाया=खज़ाना/Treasure 
  • सराब=मृगतृष्णा/Mirage
  • स्याह=काला रंग/Color Black 
  • ख़ार=काँटा/Thorn
  • सिलसिला-ए-तिजारत= व्यापार/A tendency to deceive (acc. to context) 
  • यार-ए-दरिं=पुराना दोस्त/ Old friend
  • सबा=हवा/Breeze
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